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Àwọn Àkọ́lé

Àwọn àgbègbè

  1. 0:00
    Àkọ́lé 1: कलपना कीजिए, आपके पास एक सौ रुपय का नोट है, वो कागज का एक टुकड़ा है, उस पर कुछ रेखाएं हैं, कुछ रंग हैं, एक तस्वीर है, उस कागज की कीमत शायद एक रुपय से भी कम, लेकिन आप उसे सौ रुपय मानते हैं, आप उससे सब्जिक खरीद सकत किसने तय किया कि ये कागज 100 रुपय का है, कोई सरकार, कोई बैंक, कोई कानून या हम सबने, और अगर हम सबने, तो हम सब ऐसा क्यों मानते हैं, ये सवाल ये पैसे की सबसे बड़ी पहेली है, ये कोई दारशनिक सवाल नहीं है, ये आपकी जेब से जुड़ा सवाल है, आप सब कुछ एक कागज पर विश्वास करने पर टिका है, और ये विश्वास ये कैसे बना, क्या कोई देवता नीचे आया और बोला ये सौ रुपय का है, क्या कोई राजा ने आदेश दिया, ये चलेगा, या क्या कोई और ताकत है, क्या पैसे की कीमत वो सच में किसी और के हाथ वादा की ये कागज किसी और को देने पर वो इसके बदले आपको 100 रुपए की चीज देगा ये वादा किस ने किया भारत में RBI ने उस नोट पर लिखा है मैं धारक को 100 रुपए अदा करने का वचन देता हूँ यानि RBI ने वादा किया है लेकिन RBI वो 100 रुपए किसे देगा चांदी नहीं देगा, कोई चीज नहीं देगा, क्योंकि अब पैसा वो सोने से नहीं जुड़ा है, पैसा वो सिर्फ विश्वास से जुड़ा है, तो असली सवाल ये है, ये विश्वास कहां से आता है, पैसे की कीमत वो दो चीजों से बनती है, पहली सरकार का अधिकार, सरका टैक्स आपको इसी पैसे में देना होता है, अगर ये पैसा नहीं चला तो आप टैक्स नहीं दे पाएंगे और सरकार आपको पकड़ लेगी, तो सरकार की ताकत पैसे की कीमत की पहली वजह है, लेकिन दूसरी वजह वो और भी दिल्चस्प है, दूसरी वजह है आपका विश् ये विश्वास ये कहां से आता है, ये विश्वास ये इसलिए आता है, क्योंकि कल ऐसा हुआ था, और परसों ऐसा हुआ था, और पिछले 20 सालों से ऐसा हो रहा है, यानि पैसे की कीमत वो आदत से बनी है, हम इसलिए मानते हैं, क्योंकि हम हमेशा से मानते आये हैं, ये है सबस अगर कल सब लोग ये नोट लेना बंद कर दें तो ये नोट बेकार हो जाएगा कोई सरकार, कोई बैंक, कोई कानून कुछ नहीं बचा सकता क्योंकि पैसे की कीमत वो हम सब के दिमाग में है अब इसके बारे में सोचिए मीडिया में क्या आता है डॉलर मजबूत हुआ, रु� ये सारी कीमतें वो लोगों के विश्वास से बनती हैं. 303s · Speaker 1

    कलपना कीजिए, आपके पास एक सौ रुपय का नोट है, वो कागज का एक टुकड़ा है, उस पर कुछ रेखाएं हैं, कुछ रंग हैं, एक तस्वीर है, उस कागज की कीमत शायद एक रुपय से भी कम, लेकिन आप उसे सौ रुपय मानते हैं, आप उससे सब्जिक खरीद सकत किसने तय किया कि ये कागज 10…

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    Àkọ́lé 2: क्योंकि सरकार खुद पैसा चाप रही थी, जब सरकार बहुत ज्यादा पैसा चापती है, तो लोगों का विश्वास तूटता है, और जब विश्वास तूटता है, तो पैसे की कीमत गिरती है, ये आज भी हो रहा है, तुर्की, अर्जेंटीना, जिंबाबवे, हर दशक में क क्या आप विश्वास करते हैं कि कल भी रुपया चलेगा, अगर हां तो क्यों, तो अब आप जानते हैं, पैसे की कीमत वो कोई और नहीं बनाता, हम सब बनाते हैं, हमारा विश्वास, हमारी आदत, हमारी हरकत, जब हम पैसा रखते हैं, तो हम उसकी कीमत को मानते हैं, जब हम � ये कोई साजिश नहीं है, ये एक सामाजिक व्यवस्था है, लेकिन आपके लिए सबसे बड़ा सवाल ये है, अगर पैसे की कीमत वो हम सब के विश्वास पर टिकी है, तो क्या हुआ जब हमारा विश्वास तूटेगा, क्या होगा जब लोग कहने लगें, ये नोट बेकार है क्या होगा जब दुकानदार कहे मुझे ये नोट नहीं चाहिए, क्या होगा जब बैंक कहे हम आपको ये पैसे नहीं दे सकते, क्या होगा जब सरकार कहे हमने बहुत ज्यादा पैसा छाप दिया, तब क्या होगा, क्या आपका घर बचेगा, क्या आपकी बचत बचेगी, क्या � या आप कुछ और करेंगे, सोचिए, क्योंकि जवाब वो शायद उतना सुखद न हो जितना आप चाहते हैं. 107s · Speaker 1

    क्योंकि सरकार खुद पैसा चाप रही थी, जब सरकार बहुत ज्यादा पैसा चापती है, तो लोगों का विश्वास तूटता है, और जब विश्वास तूटता है, तो पैसे की कीमत गिरती है, ये आज भी हो रहा है, तुर्की, अर्जेंटीना, जिंबाबवे, हर दशक में क क्या आप विश्वास करते हैं क…